फर्जी प्रमाणपत्रों और अवैध पदोन्नति के आरोपों के बावजूद मामला फाइलों में उलझा, कई आरोपी कर्मचारी हो चुके हैं सेवानिवृत्त

आज का चौपाल | संवाददाता, कानपुर।

कानपुर। उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) की वर्ष 2008-09 की बैकलॉग भर्ती में कथित घोटाले का मामला करीब 18 साल बाद भी पूरी तरह अंजाम तक नहीं पहुंच पाया है। इस दौरान 33 से अधिक बार जांच होने के बावजूद अब तक कार्रवाई केवल सात अधिकारियों-कर्मचारियों तक सीमित रही है। प्रमुख सचिव, आयुक्त और सतर्कता विभाग के स्तर पर हुई जांच में फर्जी प्रमाणपत्रों और कथित अनियमित पदोन्नति के आरोप सामने आने के बावजूद मामला लंबे समय तक फाइलों में उलझा रहा। इस बीच कई संबंधित कर्मचारी सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।

कई स्तरों पर हुई जांच

वर्ष 2008-09 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम में 129 पदों पर भर्ती हुई थी। आरोप है कि इस भर्ती प्रक्रिया में कई अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए और नियुक्तियों में नियमों की अनदेखी की गई। मामले की पहली जांच तत्कालीन श्रमायुक्त रणवीर प्रसाद ने की थी। उनकी रिपोर्ट में 12 अधिकारियों के प्रमाणपत्र फर्जी बताए गए थे और मामले को गंभीर आपराधिक प्रकरण माना गया था।

वर्ष 2017 में मंडलायुक्त स्तर पर हुई जांच में भी कार्रवाई की संस्तुति की गई थी। इसके अलावा औद्योगिक विकास विभाग के सचिव और अपर आयुक्त, कानपुर मंडल समेत विभिन्न स्तरों पर मामले की जांच हुई। अलग-अलग रिपोर्टों में जिम्मेदार लोगों की भूमिका सामने आने के बावजूद कार्रवाई में देरी होती रही।

फर्जी प्रमाणपत्रों से नौकरी और पदोन्नति का आरोप

शिकायत के अनुसार, स्वीकृत 129 पदों के सापेक्ष नियमों की अनदेखी कर 19 अतिरिक्त नियुक्तियां की गईं। इसके अलावा 17 अभ्यर्थियों को कथित तौर पर फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी देने का आरोप है। क्रीमी लेयर में आने वाले कुछ अभ्यर्थियों को भी आरक्षण का लाभ दिए जाने की शिकायत की गई थी।

भर्ती प्रक्रिया में मानचित्रकार, आशुलिपिक (टंकण), उप प्रबंधक (लेखा), उप प्रबंधक (सामान्य) और सहायक प्रबंधक (लेखा) समेत विभिन्न पदों पर अनियमितताओं के आरोप लगे थे। शिकायत में यह भी कहा गया कि कुछ कर्मचारियों ने कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी हासिल करने के बाद पदोन्नति भी प्राप्त की। इनमें सात कर्मचारियों के अवर अभियंता बनने का आरोप शामिल है।

तीन सेवानिवृत्त अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर

सतर्कता जांच में भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी अनियमितताओं और कथित फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप सही पाए जाने के बाद शासन के निर्देश पर तीन तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इनमें सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता एवं प्रबंधक (कार्मिक) ओएसडी अजीत सिंह, संयुक्त प्रबंध निदेशक तपेंद्र प्रसाद और सहायक प्रबंधक (कार्मिक) सुधीर कनौजिया के नाम शामिल हैं।

यह भर्ती तत्कालीन बसपा शासनकाल में हुई थी। उस समय संस्था का नाम उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम था। बैकलॉग के रिक्त पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे गए थे। मामला वर्ष 2012 में सामने आया था, जिसके बाद कई बार जांच शुरू हुई और आगे की कार्रवाई अलग-अलग स्तरों पर चलती रही।

सात कर्मचारियों पर कार्रवाई, दो को मिली बहाली

अब तक सात कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त किए जाने की जानकारी है। इनमें से दो को न्यायालय से बहाली मिल चुकी है। मामले की सतर्कता जांच पहले भी हो चुकी थी, लेकिन वर्ष 2023 में दोबारा जांच सतर्कता विभाग को सौंपी गई। इसके बाद जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

एसपी सतर्कता वैभव पांडेय के अनुसार, जांच में आरोप सही पाए गए हैं। एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। आरोपियों की वर्तमान स्थिति के संबंध में जानकारी जुटाई जा रही है।

करीब 18 साल पुराने इस मामले में अब एफआईआर दर्ज होने के बाद आगे की कार्रवाई पर नजर है। इतने लंबे समय तक चली जांच और सीमित कार्रवाई ने भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के निस्तारण को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।