इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल, टाटा और कॉग्निजेंट समेत कंपनियों पर असर की आशंका; जयराम रमेश ने सरकार की विदेश नीति पर उठाए सवाल
आज का चौपाल , नई दिल्ली।
अमेरिका में ग्रीन कार्ड से जुड़ी PERM प्रक्रिया के तहत नए आवेदन दाखिल करने पर अस्थायी रोक लगाए जाने की खबर से भारतीय आईटी कंपनियों और वहां काम करने वाले भारतीय पेशेवरों की चिंता बढ़ गई है। इस मुद्दे पर कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि अमेरिकी प्रशासन के सामने भारत के हितों की मजबूती से पैरवी नहीं की जा रही है।
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि अमेरिकी फैसले से भारतीय आईटी कंपनियों और उनके कर्मचारियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि ताकतवर नेताओं को खुश करने की कोशिशों के बजाय भारत के हितों की रक्षा पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई का संबंध PERM कार्यक्रम के तहत रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया से है। इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल, टाटा और कॉग्निजेंट जैसी भारतीय आईटी कंपनियों के साथ माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी कंपनियों पर भी इसके संभावित प्रभाव को लेकर चर्चा हो रही है। हालांकि, इस प्रक्रिया पर रोक का मतलब यह नहीं है कि इन कंपनियों में काम करने वाले सभी भारतीय कर्मचारियों के मौजूदा वीजा या रोजगार अपने आप समाप्त हो गए हैं।
PERM प्रक्रिया अमेरिका में रोजगार के आधार पर स्थायी निवास हासिल करने के एक महत्वपूर्ण चरण से जुड़ी है। इसमें नियोक्ता को यह साबित करना होता है कि संबंधित पद के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं है या विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति निर्धारित नियमों के अनुरूप है। इस प्रक्रिया में व्यवधान आने से कुछ कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड आवेदन और कंपनियों की नियुक्ति योजनाओं पर असर पड़ सकता है।
कांग्रेस ने केंद्र सरकार से इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने और भारतीय कंपनियों तथा पेशेवरों के हितों की रक्षा के लिए कूटनीतिक स्तर पर प्रभावी कदम उठाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि विदेश नीति का आकलन केवल दूसरे देशों के नेताओं से संबंधों के आधार पर नहीं, बल्कि भारत के नागरिकों और कारोबारियों के हितों की सुरक्षा के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
अमेरिका के इस कदम का वास्तविक असर रोक के दायरे, उसकी अवधि और संबंधित आवेदनों की स्थिति पर निर्भर करेगा। ऐसे में भारतीय आईटी क्षेत्र की निगाहें अमेरिकी प्रशासन के अगले फैसलों और भारत सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।


