अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई, कोर्ट ने कहा- दसवीं अनुसूची से जुड़े मामलों का शीघ्र निपटारा जरूरी; स्पीकर के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की

नई दिल्ली। एजेंसी।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 बागी लोकसभा सांसदों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से शीघ्र निर्णय लेने की उम्मीद जताई। हालांकि अदालत ने स्पीकर के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय करने का आदेश नहीं दिया। मामला टीएमसी महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की याचिका से जुड़ा है, जिसमें संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत इन सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग की गई है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह लोकसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की स्थिति में नहीं है, लेकिन दसवीं अनुसूची से जुड़े मामलों की संवैधानिक महत्ता को देखते हुए शीघ्र निपटारे की अपेक्षा की जाती है। अदालत ने 2020 के कीशम मेघचंद्र सिंह मामले में दिए गए फैसले का भी संदर्भ दिया, जिसमें दलबदल से जुड़े मामलों को उचित समय के भीतर, सामान्यतः तीन महीने के भीतर तय करने की बात कही गई थी।

अगस्त में जारी हुए थे नोटिस

अभिषेक बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत को बताया कि लोकसभा अध्यक्ष ने अगस्त में संबंधित 20 सांसदों को नोटिस जारी किए थे। उन्हें जवाब दाखिल करने के लिए शुरुआती तौर पर 14 दिन का समय दिया गया था। बाद में जवाब दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाकर 22 सितंबर कर दी गई, लेकिन इसके बाद भी सांसदों की ओर से और समय मांगा गया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कार्यवाही को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता और दसवीं अनुसूची के तहत शुरू की गई प्रक्रिया पर समयबद्ध तरीके से निर्णय होना चाहिए।

स्पीकर की ओर से क्या कहा गया

लोकसभा अध्यक्ष की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अध्यक्ष पहले ही नोटिस जारी कर चुके हैं और संबंधित सांसदों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए। उन्होंने अदालत से स्पीकर के लिए निश्चित समयसीमा तय नहीं करने का आग्रह किया।

अदालत ने भी माना कि स्पीकर एक संवैधानिक पदाधिकारी हैं और प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसके बावजूद पीठ ने कहा कि दसवीं अनुसूची के मामलों के महत्व को देखते हुए निर्णय में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए।

तीन महीने की देरी पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने करीब तीन महीने की देरी को गंभीरता से लेते हुए इसे ‘रेड फ्लैग’ बताया। अदालत ने कहा कि अयोग्यता की कार्यवाही का परिणाम अन्य संबंधित कार्यवाहियों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी असर डाल सकता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कोई बाध्यकारी समयसीमा निर्धारित नहीं की। अदालत ने मामले को लंबित रखते हुए आगे की प्रगति की जानकारी लेने का फैसला किया है। संबंधित सांसदों ने जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा है और मामले की आगे सुनवाई बाद में होगी।

दसवीं अनुसूची के तहत कार्रवाई की मांग

अभिषेक बनर्जी ने 20 सांसदों के खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्रवाई की मांग की है। टीएमसी का आरोप है कि इन सांसदों ने पार्टी से अलग होकर दूसरी राजनीतिक व्यवस्था के साथ जुड़कर दलबदल संबंधी प्रावधानों को आकर्षित किया है। दूसरी ओर, बागी सांसदों की ओर से उनके कदम को वैध राजनीतिक विलय के रूप में पेश किया गया है। इस मूल विवाद पर अंतिम निर्णय संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होना है।