नई दिल्ली | एजेंसी

नई दिल्ली। दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि बदलती जनसंख्या और घटती जन्म दर के कारण ऐसे कानूनों पर दोबारा विचार करने का समय आ गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है, ताकि वर्ष 2003 में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार किया जा सके।

अदालत ने कहा कि प्रजनन से जुड़े फैसले व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलता है।

न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

याचिकाकर्ता मंगला भीमराव इंगले को काकोड़ ग्राम पंचायत के सरपंच पद पर चुना गया था, लेकिन दो से अधिक बच्चे होने के कारण उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

अदालत ने कहा कि भारत की कुल प्रजनन दर वर्ष 2003 में 3.0 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। ऐसे में दो से अधिक बच्चों के आधार पर चुनाव लड़ने से रोकना उचित नहीं लगता।