फतेहपुर में चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन, 6 हजार से अधिक कर्मियों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य
चौपाल संवाद | फतेहपुर।
बच्चों के स्वस्थ और सर्वांगीण विकास के लिए जीवन के शुरुआती 1000 दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं। इस अवधि में उचित पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं, संवेदनशील परवरिश और सीखने के अवसर बच्चों के भविष्य की मजबूत नींव तैयार करते हैं। इसके लिए वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित संवाद और समुदाय की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। यह बात मुख्य विकास अधिकारी पवन कुमार मीना ने ‘जीवन के प्रथम 1000 दिवस’ पहल के तहत आयोजित जिला स्तरीय प्रशिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन अवसर पर कही।
जनपद में वर्ष 2022 से संचालित इस पहल के दूसरे चरण के अंतर्गत चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन 27 अक्टूबर को हुआ। कार्यक्रम में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. यू. बी. सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी दीप्ति त्रिपाठी, वैन लीर फाउंडेशन के वरिष्ठ कार्यक्रम प्रबंधक अनुभव गर्ग तथा विक्रमशिला एजुकेशन रिसोर्स सोसायटी की कार्यक्रम प्रबंधक दूर्वा घोष सहित अन्य अधिकारी और प्रतिभागी मौजूद रहे। इस दौरान प्रशिक्षण पूरा करने वाले प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र भी वितरित किए गए।
स्थानीय जरूरतों के अनुसार तैयार की गई प्रशिक्षण सामग्री
सीडीओ पवन कुमार मीना ने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रम को प्रभावी बनाने के लिए संबंधित संस्थाओं ने कई महीनों तक अध्ययन, विचार-विमर्श और उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण किया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण सहित स्वास्थ्य एवं पोषण से जुड़े आंकड़ों के आधार पर जनपद की स्थानीय चुनौतियों और जरूरतों को समझने का प्रयास किया गया। इसी के अनुरूप प्रशिक्षण सामग्री तैयार की गई, जिससे जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों को व्यावहारिक जानकारी मिल सके।
उन्होंने कहा कि बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण के साथ उनके मस्तिष्क के शुरुआती विकास, संवेदनशील परवरिश, प्रारंभिक शिक्षा तथा परिवार की भूमिका को समझना भी जरूरी है। इन विषयों पर लोगों को जागरूक करने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों और परिवारों के बीच निरंतर संवाद होना चाहिए।
6 हजार से अधिक कर्मियों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य
इस पहल के तहत तैयार किए जा रहे मास्टर ट्रेनर्स के माध्यम से स्वास्थ्य विभाग तथा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के 6,000 से अधिक अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। प्रशिक्षण के अगले चरण में संबंधित विभागों के अधिकारियों और बाल विकास परियोजना अधिकारियों के लिए संयुक्त प्रशिक्षण आयोजित करने की भी योजना है।
इसका उद्देश्य आंगनबाड़ी केंद्रों को बच्चों के अनुकूल, सुरक्षित और सीखने के बेहतर अवसरों से युक्त बनाना तथा विभिन्न विभागों के बीच समन्वय मजबूत करना है। सीडीओ ने भिटौरा ब्लॉक में सामुदायिक व्यवहार परिवर्तन के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि गैर-सरकारी संस्थाएं अपने तकनीकी अनुभव, शोध और नवाचारों के माध्यम से सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में सहयोग कर सकती हैं।
मातृ स्वास्थ्य और परिवार की भागीदारी पर जोर
प्रशिक्षण के दौरान मातृ कल्याण, गर्भावस्था में देखभाल, सुरक्षित प्रसव, नवजात शिशु की देखभाल, स्तनपान, पोषण, तनाव की पहचान और प्रारंभिक बाल्यावस्था विकास जैसे विषयों पर जानकारी दी गई। साथ ही बच्चों की देखभाल में पिता और परिवार की सक्रिय भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया।
विशेषज्ञों ने कहा कि गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक उचित पोषण, समय पर स्वास्थ्य सेवाएं, परिवार का सहयोग और स्नेहपूर्ण व्यवहार उसके शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को बच्चों की जरूरतों को पहचानने, उनकी भावनाओं के प्रति संवेदनशील रहने और परिवारों को सकारात्मक पालन-पोषण के लिए प्रेरित करने के तरीके भी बताए गए।
प्रशिक्षण सत्रों का संचालन प्रियदर्शिनी मोहंती, डॉ. अनुभा राजेश, डॉ. रूपा शंकर और दूर्वा घोष ने किया। कार्यक्रम के प्रबंधन एवं समन्वय में विक्रमशिला एजुकेशन रिसोर्स सोसायटी के जिला कार्यक्रम अधिकारी अजय लवारे ने सहयोग प्रदान किया।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. यू. बी. सिंह ने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम स्वास्थ्य एवं पोषण सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने में सहायक हैं। उन्होंने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं को बेहतर समन्वय के साथ परिवारों तक पहुंचाने पर जोर दिया।
कार्यक्रम का उद्देश्य प्रशिक्षित मास्टर ट्रेनर्स तैयार करना है, जो आगे स्वास्थ्यकर्मियों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की क्षमता बढ़ाकर समुदाय तक बेहतर देखभाल और पोषण का संदेश पहुंचाएंगे। स्वस्थ मां, सुरक्षित नवजात, पोषित बच्चा और जागरूक परिवार ही विकसित भारत की मजबूत नींव हैं।
