टूटी सड़कों, निर्माण कार्यों की धूल और खुले कूड़ाघरों ने बिगाड़ी शहर की हवा; सिविल लाइंस का वार्ड-78 प्रदेश में अव्वल

कानपुर। शहर की हवा सुधारने के लिए 300 करोड़ रुपये से अधिक खर्च और तमाम योजनाओं के बावजूद कानपुर की स्थिति इस बार स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में खराब हुई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में 10 लाख से अधिक आबादी वाले 48 शहरों की श्रेणी में कानपुर छह पायदान फिसलकर 11वें स्थान पर पहुंच गया। शहर को 200 में 183.2 अंक मिले हैं। पिछले दो वर्षों से कानपुर पांचवें स्थान पर था।

शहर की खराब रैंकिंग के पीछे लगातार चल रहे निर्माण कार्य, मेट्रो और सीवर लाइन की खुदाई, टूटी सड़कों से उड़ती धूल, खुले में पड़ा कूड़ा, घटता हरित क्षेत्र और अव्यवस्थित विकास कार्य प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। लखनऊ 198 अंकों के साथ पहले, इंदौर 197 अंकों के साथ दूसरे और जबलपुर 195 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। आगरा और गाजियाबाद भी कानपुर से बेहतर स्थिति में रहे।

दो साल से पांचवें स्थान पर था शहर

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2023-24 और 2024-25 में कानपुर पांचवें स्थान पर रहा था। इस बार रैंकिंग में गिरावट ने शहर में वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए किए जा रहे प्रयासों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

हालांकि, शहर के सिविल लाइंस स्थित वार्ड-78 ने प्रदेश स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करते हुए पहला स्थान हासिल किया है। नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय के अनुसार वैज्ञानिक तरीके से ठोस कचरा निस्तारण, धूल नियंत्रण, सीएंडडी वेस्ट प्रबंधन, हरित क्षेत्र विकसित करने और जनजागरूकता के कार्यों के आधार पर वार्ड को यह उपलब्धि मिली है। प्रयागराज का वार्ड-33 दूसरे और बरेली का गांधी उद्यान वार्ड-32 तीसरे स्थान पर रहा।

टूटी सड़कों पर छह इंच से डेढ़ फीट तक गड्ढे

शहर की हवा खराब करने में बदहाल सड़कें बड़ी वजह बन रही हैं। कई प्रमुख मार्गों पर छह-सात इंच से लेकर डेढ़ फीट तक गहरे गड्ढे हैं। वाहनों के गुजरने से धूल लगातार हवा में उड़ती रहती है। किदवई नगर, यशोदा नगर, कर्रही, लालबंगला और काकादेव के साथ कल्याणपुर क्षेत्र में जीटी रोड पर भी धूल की समस्या बनी हुई है।

मेट्रो, सीवर लाइन, पाइपलाइन और अन्य विकास कार्यों के लिए जगह-जगह हुई खुदाई ने भी परेशानी बढ़ाई है। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के लिए पानी का नियमित छिड़काव और निगरानी प्रभावी नहीं हो पा रही है।

खुले कूड़े और घटते हरित क्षेत्र ने बढ़ाई चिंता

फुटपाथों की बदहाली, उजड़ी ग्रीन बेल्ट, घटता हरित क्षेत्र और खुले में पड़ा कूड़ा भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। कई स्थानों पर कूड़े और सूखी पत्तियों में आग लगाए जाने से प्रदूषण बढ़ता है।

स्वरूप नगर समेत कई मोहल्लों में सीएम ग्रिड योजना के तहत बन रही सड़कों में मानकों के पालन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के लिए ग्रीन नेट और नियमित पानी के छिड़काव की व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी नहीं दिख रही है।

सिर्फ नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं

वायु गुणवत्ता सुधारने की जिम्मेदारी केवल नगर निगम की नहीं है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, यातायात और परिवहन विभाग की भी इसमें अहम भूमिका है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को औद्योगिक इकाइयों, निर्माण स्थलों और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियों की निगरानी करनी होती है। वहीं यातायात एवं परिवहन विभाग वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार है।

विभागों के बीच प्रभावी समन्वय और योजनाओं की नियमित निगरानी की कमी का असर शहर की रैंकिंग पर पड़ा है।

ये हैं प्रमुख कमियां

  • टूटी सड़कों से लगातार धूल उड़ना।
  • प्रमुख मार्गों पर मशीनों से नियमित सफाई का प्रभावी न होना।
  • निर्माण स्थलों पर पानी का पर्याप्त छिड़काव न होना।
  • निर्माण स्थलों पर ग्रीन नेट का इस्तेमाल न करना।
  • खुले में कूड़ा और पत्तियां जलाना।
  • निर्माण, खुदाई और खराब सड़कों से बढ़ता धूल प्रदूषण।
  • उजड़ती ग्रीन बेल्ट और घटता हरित क्षेत्र।

अगले सर्वेक्षण में सुधार की उम्मीद

नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय ने कहा कि वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए लगातार प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं। निर्माण कार्यों से निकलने वाली धूल पर नियंत्रण, सड़क सुधार, कचरा प्रबंधन और हरित क्षेत्र बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इन प्रयासों का असर आने वाले समय में शहर की रैंकिंग में बेहतर परिणाम के रूप में दिखाई देगा।