अमेरिका समेत पश्चिमी देश कह रहे हैं कि पुतिन को यूक्रेनी जिंदगियों की कोई परवाह नहीं है। पर, क्या पश्चिमी दुनिया ने गाजा में बहते हुए खून की परवाह की? अमेरिकी सीनेटरों ने एक एक्ट पारित कर ट्रंप को मॉस्को और ईरान के खिलाफ अधिक कठोर कार्रवाई करने का अधिकार देने की मंशा जताई है। अब देखना है कि आगे क्या होता है!
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी नीतियों से जुड़ी दो खबरें सामने आई हैं। एक तरफ यूगॉव और फोकलडाटा के सर्वे में ट्रंप की विश्वसनीयता संकट में पड़ती दिखाई गई है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी सीनेट ने ‘द लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ पारित कर राष्ट्रपति ट्रंप को अभूतपूर्व शक्तियां देने की मंशा जताई है।
यह एक्ट, जिसे संसद के निचले सदन में पारित होने के बाद ट्रंप की मंजूरी मिलती है, उन्हें व्लादिमीर पुतिन और रूस के अन्य बड़े नेताओं, कुलीनतंत्र, रूसी अधिकारियों, बैंकों तथा अन्य संस्थाओं पर अनिवार्य प्रतिबंध लगाने का अधिकार देगा। सवाल यह है कि क्या ट्रंप, जो पहले से ही अपनी सनक के चलते दुनिया में अनिश्चितता पैदा कर चुके हैं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था व जीवन को संकट की ओर ले जा रहे हैं, को ऐसी शक्तियां देना उचित है?
यह एक्ट मूलतः रूस पर प्रतिबंधों के लिए था, लेकिन बाद में इसमें ईरान को भी जोड़ दिया गया, जो ‘ईरान सैंक्शंस एक्ट ऑफ 1996’ की अवधि को पांच साल बढ़ाता है। यह भी एक विरोधाभास है—एक तरफ समझौता और दूसरी तरफ प्रतिबंध! आखिर अमेरिकी नीतियां इतनी भ्रमपूर्ण क्यों हैं?
इसके पीछे तर्क यह है कि ट्रंप को रूस के खिलाफ सिर्फ प्रतिबंध लगाने की शक्ति ही नहीं, बल्कि रूसी तेल खरीददारों को आर्थिक दबाव में लाने की भी छूट मिलनी चाहिए। इसमें नया क्या है? ट्रंप तो पहले से ही टैरिफ को विदेश नीति के हथियार की तरह इस्तेमाल करते आ रहे हैं। अब संभव है कि अमेरिका रूस के अलावा दूसरे भू-राजनीतिक या आर्थिक विवादों में भी आक्रामकता अपनाए।
लेकिन क्या पुतिन इससे डर जाएंगे? शायद नहीं। अमेरिका जरूर दबाव में आ सकता है, क्योंकि फोकलडाटा सर्वे में 55 प्रतिशत मतदाताओं ने ट्रंप के कामकाज को अस्वीकार किया है। इसलिए संभावना है कि अमेरिकी संकट अभी और बढ़ेगा।
दुनिया दो तरह के युद्धों से जूझती नजर आ रही है। पहला, यूक्रेन के खिलाफ रूस का युद्ध और दूसरा, क्रेमलिन के खिलाफ पश्चिमी दुनिया का ‘आर्थिक युद्ध’। मगर पूरी पश्चिमी दुनिया के प्रयासों के बावजूद रूस रुक नहीं रहा है। इसका एक कारण यह है कि जब पश्चिमी ब्लॉक प्रतिबंध लगा रहा था, तब रूस अपनी अर्थव्यवस्था को युद्ध के अनुकूल ढाल रहा था। यही उसकी उत्तरजीविता का कारण बना।
अब सवाल यह है कि पुतिन यूक्रेन में जो कर रहे हैं, वह कितना सही और कितना गलत है। पश्चिम की नजर में पुतिन युद्ध अपराधी हैं, लेकिन दूसरों की नजर में वह पूंजीवादी धुरी को चुनौती दे रहे हैं। सच क्या है?
पश्चिमी दुनिया प्रायः किसी देश को लोकतांत्रिक, किसी को आधुनिक और किसी को मानवाधिकारों से संपन्न बनाने का दावा करती रही है। दूसरी ओर, उसी पश्चिम पर लोकतंत्रों को कमजोर करने, आधुनिकता के नाम पर औपनिवेशिक व्यवस्था को बढ़ावा देने और मानवाधिकारों के नाम पर युद्ध, हत्याओं तथा विस्थापन का आरोप भी लगता रहा है।
यूक्रेन में भी पश्चिम ने आधुनिकीकरण का दावा किया, लेकिन उसके उद्देश्यों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो यूरोप अपने आदर्शवादी संघवाद को बचाने में संघर्ष कर रहा है, वही यूक्रेन की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बचाने का दावा कर रहा है। अमेरिका खुद घरेलू राजनीति में विभाजन, ध्रुवीकरण और सामंजस्य की कमी से जूझ रहा है, लेकिन उसके नेता यूक्रेन समेत शेष दुनिया की ओर देख रहे हैं।
दरअसल, नाटो शक्तियां सोवियत संघ के खंडहरों पर उभरे ‘कॉमनवेल्थ ऑफ स्टेट्स’ (सीआईएस) के हर दरवाजे पर एक पश्चिमी चौकी खड़ी करना चाहती हैं। गौर से देखें तो यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद बहुत से नकाब उतर गए हैं। दिलचस्प यह है कि युद्ध से सभी नुकसान में हैं और फायदा चीन को हो रहा है।
युद्ध के बाद ही रूस और चीन ‘अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक नए युग’ में प्रवेश कर गए। इसके बाद चीनी और रूसी अर्थव्यवस्थाओं ने आपसी गठजोड़ मजबूत करने में सफलता हासिल की।
रूस भले ही गलत नजर आए, लेकिन उसे एकांगी दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। इस पूरे मामले में कई पेच हैं। पहला यह कि पश्चिमी देशों ने यूक्रेन में लगातार उन दक्षिणपंथी ताकतों का समर्थन किया, जो रूस-विरोधी गतिविधियों में लिप्त थीं। यह प्रक्रिया सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही शुरू हो गई थी।
वहां कुछ ऐसी शक्तियां पैर पसारने लगी थीं, जिनका उद्देश्य नए संघर्षों को जन्म देकर अपने हितों को पूरा करना था। यूक्रेन में दक्षिणपंथी और नव-नाजी समूहों को प्रोत्साहित किया गया, ताकि वे रणनीतिक तौर पर मजबूत हो सकें। पश्चिमी ताकतें इन्हें लगातार समर्थन देती रहीं।
इसके साथ यदि भाषाई अतिवाद को भी जोड़ दें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। राइट सेक्टर, स्वोबोदा और द्वितीय विश्व युद्ध के समय के राष्ट्रवादी संगठन जैसे स्टेपान बांदेरा से जुड़े समूह पूरी तरह रूस-विरोधी और नाजी समर्थक रहे। इनका एक उद्देश्य यूक्रेन तथा कुछ अन्य देशों में रूसियों के खिलाफ अभियान चलाना था।
अगर करीब एक सदी पीछे जाकर देखा जाए तो अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों पर इन दक्षिणपंथी ताकतों को उसी तरह समर्थन देने के आरोप लगते हैं, जिस तरह उन्होंने 1930 के दशक में नाजीवाद, फासीवाद और जापानी सैन्यवाद को गुप्त समर्थन दिया था।

