80 वर्ष की उम्र में लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने चौथी बार राष्ट्रपति पद हासिल किया। अब चुनौती इस राजनीतिक बढ़त को देश की राजनीति में स्थायी बदलाव में बदलने की है।

गिलहर्मे कासारोएस

तीन हफ्ते पहले तक ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा के राजनीतिक भविष्य पर विराम लगता दिखाई दे रहा था। उनके राजनीतिक जीवन के अंत की घोषणाएं होने लगी थीं। राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार दक्षिणपंथी फ्लेवियो बोल्सोनारो, जो जेल में बंद पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं, पहले दौर के चुनाव में ऐसी बढ़त हासिल कर चुके थे कि उनकी हार लगभग असंभव मानी जा रही थी। 80 वर्ष की उम्र में ब्राजील की राजनीति के केंद्र में चार दशक बिताने के बाद लूला चुपचाप विदाई की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे थे।

लेकिन रविवार को लूला ने सभी आकलनों को गलत साबित कर दिया। उन्होंने दूसरे दौर का चुनाव जीतकर ब्राजील के राष्ट्रपति के रूप में अपना चौथा कार्यकाल हासिल कर लिया। यह ऐतिहासिक इसलिए है, क्योंकि ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में अब तक ऐसा नहीं हुआ था कि कोई उम्मीदवार पहले दौर में बढ़त हासिल करने के बाद दूसरे दौर में हार गया हो। लूला ने तीन सप्ताह के भीतर पहले दौर में लगभग 22 लाख मतों से मिली हार को निर्णायक जीत में बदलकर इस परंपरा को तोड़ दिया।

इतना ही नहीं, उनका नया कार्यकाल पूरा होने तक लूला कुल 16 वर्ष तक गैर-लगातार देश का शासन संभाल चुके होंगे। यह ब्राजील के इतिहास में लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित किसी भी नेता का सबसे लंबा कार्यकाल होगा।

लूला की जीत का महत्व

ब्राजील की सीमाओं से आगे भी लूला की जीत के कई मायने हैं। वैश्विक स्तर पर ब्राजील अब भी धुर दक्षिणपंथ के उभार के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक अवरोध के रूप में देखा जा रहा है। लैटिन अमेरिका और यूरोप में हाल के चुनावों के दौरान कई देशों में धुर दक्षिणपंथी दलों और नेताओं ने प्रगति की है, लेकिन दुनिया के चौथे सबसे बड़े लोकतंत्र ब्राजील ने इस प्रवृत्ति को उलट दिया है।

ब्राजील की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में थी, लेकिन आर्थिक प्रगति सीमित रही और उसका लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचा। कई संकेत लूला की हार की ओर इशारा कर रहे थे, फिर भी उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में जीत हासिल की।

उनकी जीत उस नीति पर भी सवाल उठाती है, जिसे आलोचक ‘डोनरो सिद्धांत’ कहते हैं। इसका आशय ट्रंप प्रशासन की उस कोशिश से है, जिसके तहत शुल्क, धमकियों और राजनीतिक संरक्षण के जरिये पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभाव को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।

हालांकि, लूला को अपनी राजनीतिक वापसी को अपनी नीतियों की पूरी स्वीकृति नहीं समझना चाहिए। यह सही है कि उन्होंने अपनी रणनीति में सुधार किया। तीन सप्ताह के भीतर उन्होंने सत्ता में अपने चार वर्षों के दौरान हुई गलतियों को स्वीकार किया, विशेष रूप से पहले दौर के कमजोर चुनाव अभियान के दौरान हुई चूकों को। उन्होंने अपना संदेश अधिक स्पष्ट किया, गठबंधन का दायरा बढ़ाया और उन मतदाताओं से सीधे संवाद किया, जिनका समर्थन वह खो चुके थे।

लेकिन अब उन्हें ऐसे देश का शासन चलाना है, जो पहले से कहीं अधिक ध्रुवीकृत हो चुका है। सड़कों पर राजनीतिक हिंसा बढ़ी है और इंटरनेट पर घृणास्पद भाषणों का प्रसार बेरोकटोक हो रहा है। धुर दक्षिणपंथ की प्रमुख हस्तियों, जिनमें निकोलस फरेरा और लुकास पावोनाटो शामिल हैं, ने पहले ही कहा है कि वे चुनाव परिणाम स्वीकार नहीं करेंगे। रविवार देर रात बोल्सोनारो ने भी कहा कि वह हार नहीं मानेंगे और मतदान को रद्द कराने की कोशिश करेंगे।

इसके बाद अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठता है। व्हाइट हाउस और बोल्सोनारो परिवार के बीच करीबी संबंधों को देखते हुए यह आशंका बनी हुई है कि ट्रंप प्रशासन चुनाव परिणाम पर सवाल उठा सकता है या उसे मान्यता देने से इनकार कर सकता है।

लूला के सामने तीन बड़ी चुनौतियां

जब लूला पांच जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे, तो तीन सवाल उनके चौथे कार्यकाल की दिशा तय करेंगे।

पहला सवाल यह है कि वह गहरे विभाजन से जूझ रहे देश का शासन कैसे चलाएंगे। संसद में रूढ़िवादी दलों का बहुमत है और एक दर्जन से अधिक राज्यों में दक्षिणपंथी गवर्नर हैं। पिछले चार वर्षों के दौरान जिस विधायिका ने लूला को दबाव में रखा, वह अब उनके प्रति और अधिक विरोधी हो सकती है। प्रत्येक बजट, सुधार और नियुक्ति के लिए कठिन बातचीत करनी होगी। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान लूला पर महाभियोग का खतरा भी मंडरा सकता है।

दूसरी चुनौती देश की व्यवस्था को दुरुस्त करने की है। उन्हें उन समस्याओं से निपटना होगा, जो दलीय विवादों से कहीं अधिक व्यापक हैं। इनमें सरकारी खर्च बढ़ने से पैदा हो रहा राजकोषीय दबाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे में लगातार गिरावट और ऐसी संस्थागत व्यवस्था शामिल है, जो अब अपनी निर्धारित भूमिका के अनुरूप काम नहीं कर रही है।

तीसरा सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। क्या लूला, उनकी वर्कर्स पार्टी (पीटी) और ब्राजील की व्यापक लोकतांत्रिक शक्तियां इस अस्थायी राहत का इस्तेमाल देश की राजनीति को नया स्वरूप देने के लिए करेंगी?

इसका अर्थ होगा ऐसे नए राजनीतिक नेतृत्व के विकल्प तैयार करना, जो उन बुजुर्ग नेताओं से आगे बढ़ सकें, जिन्होंने पिछले 40 वर्षों से वामपंथी राजनीति पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा है। इसके साथ ही जनभागीदारी के ऐसे नए तरीके विकसित करने होंगे, जो किसी एक करिश्माई नेता पर निर्भर न हों।

ऐसा नया राजनीतिक विमर्श भी तैयार करना होगा, जो अस्थिर रोजगार वाले श्रमिकों, धार्मिक परिवारों और उन नाराज मतदाताओं तक पहुंचे, जो धीरे-धीरे धुर दक्षिणपंथ की ओर आकर्षित हुए हैं। राजनीतिक ध्रुवीकरण का वास्तविक विकल्प तैयार करने के लिए यह बदलाव जरूरी होगा।

यह परिवर्तन न तो किसी एक चुनाव से आएगा और न ही किसी एक नेता के प्रयास से।

लूला दा सिल्वा की राजनीतिक वापसी ने ब्राजील को समय दिया है। लेकिन क्या यह समय देश को कुछ और भी दे पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लूला और उनके सहयोगी अगले चार वर्षों में क्या करते हैं और किस तरह एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं।