शंकर अय्यर
हर मानसून मुंबई के लोगों को 26 जुलाई, 2005 की याद दिलाता है, जिस दिन भयंकर मानवीय भूलों और प्रकृति ने मिलकर भारी तबाही मचाई थी। उस आपदा में लगभग एक हजार लोगों की मौत हुई थी, घरों एवं आजीविकाओं का भारी नुकसान हुआ और अकथनीय दुखों के निशान शेष रह गए थे। उस आपदा ने भारत के शहरीकरण की तमाम गलतियों को उजागर कर दिया-योजना से लेकर कार्यान्वयन तक, अधिकार से लेकर जवाबदेही तक और खर्च से लेकर परिणाम तक। लगभग दो दशक बाद पिछले हफ्ते एक बार फिर मुंबई ने खुद को संकट में पाया। वर्ष 2005 में 900 मिलीमीटर वर्षा होने पर मुंबई में तबाही आई थी, इस वर्ष उस बारिश की मात्रा के बमुश्किल एक तिहाई हिस्से ने ही शहर को ठप कर दिया।
पुणे में, जिसे कभी ‘स्मार्ट सिटी’ का खिताब मिला था और आज भी कई स्टार्ट-अप का केंद्र है, लोगों को बचाने के लिए सेना की दो टुकड़ियां बुलानी पड़ीं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कई हिस्से पानी में डूबे हुए हैं, जो व्यवस्थागत सुस्ती का प्रमाण है। बारिश जनित बाढ़ ने आईएएस की तैयारी कर रहे तीन युवाओं की जान ले ली, क्योंकि बेसमेंट में संचालित हो रही लाइब्रेरी में पानी भर गया था। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का खेल नौकरशाही और निर्वाचित सरकारों की जिम्मेदारी से बचने और लापरवाह रवैये का ही उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि बाढ़ के कारणों का अध्ययन नहीं किया गया है या सुझावों का पालन नहीं किया गया है। वर्ष 2005 की आपदा के बाद माधव चितले के नेतृत्व में तथ्यों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। उसने अपने निष्कर्ष में भारी बारिश, गाद नहीं निकालने के कारण पानी के बहाव में रुकावट, आपदा प्रबंधन योजना का गैर-संचालन, संवाद एवं तालमेल की कमी, मौसम की सही चेतावनी न मिलने और ऐसे ही कई अन्य कारणों को गिनाया था।
दिसंबर 2005 में यूपीए सरकार ने जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन की शुरुआत की, ताकि सुधारों को प्रोत्साहित किया जा सके और योजनाबद्ध विकास को गति दी जा सके। मिशन ने कई विचार सूचीबद्ध किए, लेकिन ‘बाढ़’ शब्द को उसमें जगह नहीं मिली। बार-बार होने वाली घटनाओं के पांच साल बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने शहरी बाढ़ के संकट को पहचाना और ‘क्या करें और क्या न करें’ की सूची बनाई। इसके बाद कई समितियों और आयोगों का गठन हुआ, जिन्होंने कई विवेकपूर्ण सलाह भी दीं। लेकिन चीजें नहीं बदलीं। बातें तो बहुत हुईं, लेकिन काम बहुत कम हुआ। ठीक एक साल पहले भी बाढ़ का पानी राष्ट्रीय राजधानी में घुस गया था। हर साल देश के दर्जनों शहर मानसून के आते ही प्रशासनिक विफलता और प्रकृति के प्रकोप के चलते सहमे दिखते हैं। सरकार ने खुद स्वीकार किया कि वर्ष 2021 में देश के पांच राज्यों के 30 से ज्यादा शहर बाढ़ से प्रभावित हुए थे।
भारत में घटना या आपदा के बाद ही उसके नतीजों को देखकर नीतिगत प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है, उसके कारण पर विचार को भविष्य के लिए छोड़ दिया जाता है। जुलाई 2014 में अपने पहले बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने हालात पर प्रकाश डालकर एक उम्मीद जगाई थी। उन्होंने कहा था, “जब तक बढ़ती आबादी के हिसाब से नए शहर विकसित नहीं किए जाते, मौजूदा शहर जल्द ही रहने लायक नहीं रह जाएंगे। प्रधानमंत्री का सपना है कि 100 स्मार्ट सिटी विकसित की जाएं और मौजूदा मझोले आकार के शहरों का आधुनिकीकरण किया जाए।” जेटली बजट के बाद शुरू किए गए स्मार्ट सिटी मिशन में बाढ़ की रोकथाम को प्राथमिकता में नहीं रखा गया।
गौरतलब है कि स्मार्ट सिटी मिशन के तहत 100 शहरों में 1.64 लाख करोड़ रुपये की 8,000 से अधिक परियोजनाओं को वित्त पोषित किया गया है, लेकिन बाढ़ पर ध्यान केंद्रित नहीं किया गया है। अमृत मिशन में मात्र जल निकासी की कमी को दूर करने पर ध्यान दिया गया है, लेकिन वर्ष 2023 तक 1,622 करोड़ रुपये की लागत वाली केवल 719 परियोजनाएं ही पूरी हुई हैं। भारी बारिश के कारण बाढ़ आती है, लेकिन खराब जल निकासी, उच्च स्तर पर गाद, नदियों एवं अन्य जल निकायों के क्षेत्र में अतिक्रमण, तटीय शहरों में आर्द्रभूमि के विनाश और जंगलों की कटाई के कारण यह आपदा में तब्दील हो जाती है।


