भाजपा अध्यक्ष बनने के करीब सात महीने बाद नितिन नवीन की टीम घोषित हो गई। इसकी चर्चा इसलिए भी अधिक हो रही है, क्योंकि इसमें विलंब हुआ। किसी के लिए समझना कठिन है कि भाजपा अध्यक्ष को अपनी नई टीम बनाने में इतनी देर क्यों हुई। इस देरी का कारण जो भी हो, यह टीम ऐसे समय गठित हुई है, जब मोदी सरकार विपक्ष के आक्रामक तेवरों का सामना कर रही है।

राजनीतिक इरादों से लैस नजर आने वाली कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की ओर से नीट पेपर लीक मामले में आंदोलन छेड़ने और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर अड़ जाने के बाद जो माहौल बना, उसका विपक्ष ने जमकर लाभ उठाया। इसी के नतीजे में संसद का मानसून सत्र सुचारू रूप से नहीं चल सका। सरकार जिस तरह संसद में गतिरोध तोड़ने में नाकाम रही, उससे यह संदेश निकला कि विपक्ष उस पर भारी पड़ा।

सरकार यह भांप नहीं सकी कि विपक्ष केवल गोलपोस्ट बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि मुद्दों को लेकर भाग खड़ा होने की रणनीति पर भी काम कर रहा है। नितिन नवीन की टीम को तत्काल प्रभाव से सक्रिय होना होगा, क्योंकि अगले वर्ष कम से कम सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश भी है।

नितिन नवीन की टीम के सामने पार्टी और साथ ही केंद्र सरकार एवं अपनी राज्य सरकारों के पक्ष में नैरेटिव बनाने की भी चुनौती है।