आगामी विधानसभा चुनावों वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे अधिक चर्चा में है।
इसकी वजह साफ है—केंद्र की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता भी इसी राज्य से होकर गुजरता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कौन-सा दल किन जातियों का बड़ा गठजोड़ बना सकता है। असली सवाल यह है कि नागरिक अपनी सरकार से क्या अपेक्षा रखते हैं—सुरक्षा, अवसर, सम्मान और विकास या फिर शिकायत दर्ज कराने, नौकरी पाने और सरकारी योजनाओं का लाभ हासिल करने के लिए किसी जातीय संरक्षक की तलाश?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पक्ष में मजबूत तर्क यह है कि उन्होंने राजनीति की दिशा को जातीय संरक्षण से निकालकर कानून के शासन की ओर मोड़ने का प्रयास किया है। वहीं, अखिलेश यादव की राजनीति का केंद्रीय सूत्र ‘पीडीए’—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—है। सामाजिक न्याय का प्रश्न महत्वपूर्ण है और प्रतिनिधित्व भी जरूरी है, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य को केवल जातियों के जोड़-घटाव के आधार पर नहीं चलाया जा सकता।
राज्य तभी आगे बढ़ता है, जब हर नागरिक को यह भरोसा हो कि कानून उसके साथ जाति, पंथ या उपनाम देखकर अलग व्यवहार नहीं करेगा। हाल की राजनीतिक भाषा में यह अंतर साफ दिखाई देता है। वर्ष 2017 से पहले प्रदेश में ‘रूल ऑफ माफिया’ था और अब ‘रूल ऑफ लॉ’ है—योगी सरकार का यह दावा केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि शासन की एक स्पष्ट अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
दूसरी ओर, अखिलेश यादव अपनी रणनीति को मुस्लिम-यादव आधार, पीडीए और युवाओं की नाराजगी के गठजोड़ के रूप में पेश कर रहे हैं। यहां एक तरफ राज्य के शासन और भविष्य की दिशा का सवाल है, तो दूसरी तरफ सत्ता तक पहुंचने के लिए सामाजिक समूहों की चुनावी गोलबंदी का प्रश्न।
जाति का सवाल अप्रासंगिक नहीं है। उत्तर प्रदेश में लंबे समय से वंचित दलितों, पिछड़ों और कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व, आरक्षण, सम्मान और सुरक्षा चाहिए। लेकिन सामाजिक न्याय और जातिवादी राजनीतिक संरक्षण एक ही बात नहीं हैं। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि सरकार अवसरों की समानता सुनिश्चित करे, कानून सबके लिए निष्पक्ष हो और विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।
आगामी चुनाव में मतदाताओं के सामने यही निर्णायक प्रश्न होना चाहिए—क्या राजनीति नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति स्वतंत्र और जागरूक बना रही है, या उन्हें सुविधाओं और न्याय के लिए किसी राजनीतिक अथवा जातीय संरक्षक पर निर्भर रख रही है? उत्तर प्रदेश का भविष्य केवल चुनावी समीकरणों से नहीं, बल्कि सुशासन, सामाजिक न्याय, सुरक्षा और विकास के वास्तविक परिणामों से तय होगा।

