उवर्षों की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बांग्लादेश ने भारत को लेकर अपनी पसंद का दांव चला और नई दिल्ली ने इन अनुकूल समीकरणों को हरसंभव तरीके से भुनाने का काम किया। बांग्लादेश की राजनीति में बीते डेढ़ दशक तक शेख हसीना के दबदबे से पहले ढाका के साथ भारत के रिश्ते बड़े कठिन दौर में थे और नई दिल्ली में शायद ही उसे लेकर कोई आशा की किरण दिखती थी। बांग्लादेश के आर्थिक उभार के साथ ही भारत के पड़ोसियों की बीजिंग से बढ़ती निकटता स्पष्ट हो गई।
भारत के पड़ोसियों की नियति मुख्य रूप से भारत द्वारा निर्धारित की जाएगी! यह आकलन उतना ही गलत है, जितना यह सोचना कि भारत की नियति को उसके पड़ोसी तय करेंगे। एक चुनौतीपूर्ण पड़ोस के बावजूद भारत के अंतरराष्ट्रीय कद में निरंतर वृद्धि हुई है। भारत के उदय के साथ उसके पड़ोसी देशों को आर्थिक उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा है। भारत की पड़ोस नीति की आलोचना करते समय इन देशों की वस्तुस्थिति का भी ध्यान रखना आवश्यक है। नई दिल्ली के प्रयास निश्चित रूप से एक पहलू हैं, लेकिन सफलता केवल इन्हीं प्रयासों पर निर्भर नहीं करती। तार्किक नीति यही कहती है कि भारत को अपने पड़ोस में निरंतर निवेश करना चाहिए और यह भी स्वीकार करना चाहिए कि इस निवेश का परिणाम उसके पड़ोसियों के हाथ में है।
हर्ष वी. पंत
आदर्श पड़ोस एक मिथ्या धारणा है। दैनिक जीवन में भी हमें अपने पड़ोसियों से सामंजस्य बिठाने के लिए कई बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पड़ोसियों के अभाव में हम अपूर्ण महसूस करते हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति में भी उनके साथ मेल-मिलाप चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इस कारण से, पड़ोसियों के साथ तालमेल एक निरंतर प्रयास है और इसका कोई निश्चित समाधान नहीं है।
यह स्थिति देशों के साथ भी होती है। चाहे कोई देश छोटा हो या बड़ा, वह अपने पड़ोस को लेकर संघर्ष करता ही दिखता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सही कहा था, “आप अपने मित्र चुन सकते हो, लेकिन पड़ोसी नहीं।” यही कारण है कि आदर्श पड़ोसी जैसी कोई स्थिति नहीं होती और न ही आदर्श पड़ोस नीति। भारत और उसका पड़ोस भी इस वास्तविकता से अछूता नहीं है।
जब भी भारत के किसी पड़ोसी देश में कुछ अप्रत्याशित होता है, तो कूटनीतिक हलकों में सवाल उठते हैं कि इसका पूर्वाभास क्यों नहीं हुआ। मजे की बात यह है कि सवाल उठाने वाले अक्सर वही होते हैं जो अतीत में खुद भी इसी स्थिति का सामना कर चुके होते हैं। वर्तमान की आलोचना में अतीत की बातों को भुला दिया जाता है। समाधान के रूप में वही घिसे-पिटे सुझाव सामने रखे जाते हैं, जो पहले भी कई बार आजमाए जा चुके हैं।
बांग्लादेश का मामला
बांग्लादेश का मामला इस समय सबसे अधिक चर्चा में है, क्योंकि वहां शेख हसीना सरकार का तख्तापलट हुआ है। इस घटना ने एक बार फिर से भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई दिल्ली की सीमाओं को उजागर किया है। बांग्लादेश में इतने बड़े परिवर्तन का सही आकलन न कर पाने की समस्या उतनी ही बांग्लादेशी तंत्र की भी है जितनी भारतीय नौकरशाही और खुफिया तंत्र की।
बीते 15 वर्षों में भारत-बांग्लादेश संबंध मील के पत्थर साबित हुए हैं। शेख हसीना के दबदबे से पहले भारत के लिए ढाका के साथ संबंध प्रगाढ़ बनाना कठिन था, लेकिन अब एक बार फिर भारत-विरोधी भावनाओं का ज्वार उठ रहा है, जैसा कि बीएनपी सरकार के दौरान देखा गया था।
मालदीव और अन्य पड़ोसी
इसी तरह, मालदीव में मोहम्मद मुइज्जू के सत्ता में आने से भारत को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत को यह समझना होगा कि महान राष्ट्र अपनी आधारभूमि पर मजबूती से टिके रहते हैं, लेकिन उसके बावजूद पड़ोस में गलतियों को दोहराने से बचने की आवश्यकता है।
भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंध हमेशा कठिन रहे हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि कभी कोई स्वर्णिम दौर रहा हो जब भारत का वर्चस्व पड़ोस में निर्विवाद रहा हो। पाकिस्तान ने हमेशा भारत के समकक्ष खुद को प्रस्तुत करने की कोशिश की है। समय-समय पर अन्य पड़ोसी देशों ने भी दूसरे देशों के साथ संबंधों को बढ़ाकर भारत के साथ अपने रिश्तों की दशा-दिशा तय की है।
भारत के बगल में चीन का प्रभाव भी एक बड़ी चुनौती रहा है, जिससे भारत को निरंतर रणनीतिक और कूटनीतिक प्रयास करने की आवश्यकता बनी रहती है।

