काफी दिनों बाद विपक्ष और खासकर कांग्रेस को एक सफलता मिलने का अहसास हो रहा है। उसकी जो चाहत थी, वह पूरी हो गई। मानसून सत्र करीब-करीब धुल गया और परिसीमन विधेयक भी नहीं आ पाया। डीएमके के विपक्षी खेमे से बाहर जाने और कांग्रेस के खिलाफ तीखे तेवर अपनाने, शरद पवार गुट की एनसीपी के बदले सुर, तृणमूल में टूट जैसी कई घटनाओं ने कांग्रेस को आशंकित कर रखा था। ऐसे में छात्र आंदोलन के रूप में उसके हाथ बटेर आ गया। कुछ सत्तापक्ष की रणनीति भी मात खा गई और विपक्ष की मंशा पूरी हो गई।

लेकिन विपक्ष को यह सोचना होगा कि लंबी राजनीति में ऐसे अवरोध की रणनीति बहुत काम नहीं आती। परिसीमन तो संवैधानिक व्यवस्था है और वह होगा ही। वह कांग्रेस नहीं रोक पाएगी और उसमें अभी विपक्षी खेमे में खड़े कई दल भी उसका साथ देंगे। लिहाजा सफलता को स्थायी बनाना है तो शोर-शराबे की राजनीति से आगे जाकर विमर्श की ऐसी राजनीति सीखनी और करनी होगी, जिससे जनता उसके नैरेटिव को समझ सके।

विपक्ष ने रणनीति के तहत सत्र को नहीं चलने देने का मन बना लिया था। फिर भी यदि सत्तापक्ष सदन चलाने की सार्थक पहल करता तो विमर्श में शायद आगे दिखता। जिस तरह पूरा सत्र हठधर्मिता के कारण बाधित हुआ, वह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। विपक्ष अगर सार्थक मुद्दों पर सकारात्मक जीत हासिल करे, तभी लोकतंत्र की सफलता है।

वैसे तो 2014 के बाद से कई बार और 2024 के बाद से अधिकतर यही देखा गया है कि संसद सत्र से ठीक पहले कुछ ऐसे मुद्दे उभरते हैं, जिन्हें विपक्ष लपक लेता है। तंज-तंज पर सीजेपी का आंदोलन ऐसा ही एक मुद्दा था। इससे पहले भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर किसान आंदोलन खड़ा करने की तैयारी थी, जो वस्तुतः अभी फाइनल ही नहीं हुआ है।